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प्राथमिक परिचय / ध्येय –

चक्रधारी – जैसा की नाम से ही विदित है के पूर्ण रूप से सुदर्शन चक्रधारी श्री कृष्ण के नाम सिद्धांतों व उन्ही की आज्ञा से एक संघठन का निर्माण हुआ है । जिसमें भारतीय संस्कृति की कमाल की धरोहर को हम अपने जीवन में उतार कर पुनः स्वस्थ बने, समृद्धिशाली बनें, हम देश के प्रति नेक हों, सब मिलकर एक हों । आओ हम पुनः लौट चले ऐसी सभ्यता की ओर जो वर्तमान युग से बहुत आगे थी – चाहे धर्म के दृष्टिकोण से चाहे विज्ञान के दृष्टिकोण से । भारत में जन्म ही अपने आप में – गौरव है – और ऐसा ही हम अनुभव कर पाएं – कुछ ऐसी चेष्टा करें ।

उद्देश्य –

सत्य की जय हो – सत्य ही प्रकट हों, इसी नियम पर हमारी वैदिक संस्कृति का हमारे पूर्वजों ने निर्माण किया था, उसी को फिर से जागृत करने का उद्देश्य है । जहाँ दुनिया वैदिक सभ्यता से बारम्बार लाभान्वित हों रही है – चाहे अमरीका हो या जर्मनी – भारतीय अध्यात्म को बहुत रूचि की दृष्टि से देखते हैं – उसे ही हम कम से कम इस देश में रहकर तो स्वयं अपने जीवन में प्रयोग कर पाएं, ऐसा उद्देश्य ।

क्या करते हैं –

मूल रूप से रुद्राक्ष, रत्न, धातु, जड़ीबूटी, समुद्री रत्न आदि मूल वस्तुओ पर व उनकी वैदिक उपयोगिता पर हम कार्य करते हैं । जिस प्रकार जीवन में अनेकानेक साधन होते हैं – जैसे यात्रा करने के लिए गाडी, ठीक उसी प्रकार हमारे जीवन के कष्टों को कम करने के लिए यह कुछ साधन हैं जो प्रकृति प्रदत्त हैं । किन्तु बात बार – बार एक ही सामने आती है – के इस युग में नुक्कड़ नुक्कड़ पर इनमे से कई वस्तुए मिलती हैं, किन्तु अधिकतर नकली होती हैं – जिसमें आपका अर्थ, समय यहाँ तक की विश्वास भी व्यर्थ जाता है । और ऐसा होने पर लोग समझ नहीं पाते और नाम लगाते हैं वैदिक सिद्धांतों पर, के यह कारगर नहीं । जबकि दूसरी ओर उन लोगों का अनुभव निराला होता है जिन्होंने इन वैदिक रूप से निर्मित, प्रकृति प्रदत्त असली वस्तुओ का प्रयोग किया । यही है हमारा काम – के सही वस्तु को जो कारगर है – आप तक पहुंचाया जाए ।

संस्था संचालक परिचय –

सुदर्शन चक्रधारी श्री कृष्ण ही जब इस दुनिया के संचालक हैं, तो यह संस्था भी इसी दुनिया में है और इसके संचालक भी वे ही हैं । फिर भी कृष्ण ने अपने भक्त – सौरभ सोनी को निमित्त बना कर यह दायित्व सौंपा है के संसार में ऋषियों की देन को पुनः परोसा जाए और दुनिया की प्रसन्नता में स्वयं भी प्रसन्न हों आनंद लिया जाये । डिग्री के नाम पर – विद्यालय पश्चात – B.COM, MBA – FINANCE, MARKETING, PG DIPLOMA DRAMA, MA – हिंदी, इत्यादि में भी वह आनंद नहीं आया जो आनंद – बचपन में रामायण, महाभारत, चाणक्य नीति आदि ग्रंथो में आता था । यही से वह प्रेरणा प्रखर होती चली गयी के – अन्यत्र सभी पुस्तके जो भारत अध्यात्म कहता है उन्हें खंगाल लिया जाए, और दिन-ब-दिन सत्यता के धनि होते चले गए । फिर जीवन में कई मोड़ ऐसे आये के साथ मिला उन सन्यासियों का, ऋषियों का जिनसे भारत का भरपूर ज्ञान मिले, पश्चात कुछ ऐसे अनुभव भी हुए ध्यान के माध्यम से के प्रकृति से प्रश्न किये जाये और बदले में प्रकृति ने उत्तर ऐसे दिए मानो – मस्तिष्क में बिजली कौंधी हों सत्यता की और सारा रहस्य प्रकट होने लग गया । और आखिरकार यह पूर्ण विश्वास हों गया के वैदिक सिद्धांत आज भी उतने ही कारगर हैं जितने कई सहस्त्र वर्षों पहले हुआ करते थे। आइये हम सब मिलकर हाथ मिलाएं हाथ मिलाएं और इस चिरंजीवी संस्कृति में स्वयं को डूबा देवें, उससे हमे इतना मिलेगा की स्वयं खोज करे तो लाखों वर्षो में भी ना मिले ।

।। जय चक्रधारी ।।

।। ॐ का झंडा ऊँचा रहे ।।

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